जीवन एक त्यौहार

"अस्तित्व एक उत्सव की तरह हमारे साथ है और जीवन एक त्यौहार है,जहाँ मात्र उत्सव ही उत्सव है।जब हम जीवन में उत्सवों को जीने लगते हैं हमारा जीवन उसी क्षण ही परिवर्तित होते जाता है"

एक बहुत ही सुन्दर कहानी मुझे याद आती है, एक बहुत पुरानी बात है कि एक बार एक सन्यासी गंगा नदी के घाट पर बैठा हुआ था, बैठे बैठे उसने देखा कि एक व्यापारी का परिवार माँ गंगा को लगातार पूज रहा था और अलग अलग तरीकों से जीवन के लिए वरदान मांग रहा था, कुछ दिनों में जब सन्यासी लगातार गंगा जी के घाट पर जाता उसे यह व्यापारी का परिवार लगातार यही करता दिखाई दिया, एक दिन सन्यासी ने व्यापारी से पूछ ही लिया कि तुम माँ गंगा से क्या मांग रहे हो ? और कब तक मांगते रहोगे ? व्यापारी ने कहा वह माँ गंगा से जीवन की खुशियाली मांग रहा है। तब सन्यासी ने पूछा क्या तुम जीवन में खुश नहीं हो ? अगर नहीं हो तो चलो तुम्हारे खुश न होने के कारण तलाशते हैं,क्योंकि इस जीवन में केवल खुश होने के कारण है, यह अस्तित्व उत्सवों से भरा हुआ है लगता है तुमने उत्सवों में भाग लेना सीखा ही नहीं? 

सन्यासी की बातों को सुनकर व्यापारी गंभीर हो चूका था, उसे यह भी लग रहा था की सन्यासी की बातों का गहरा अर्थ भी है, इसलिए व्यापारी अब चुपचाप सन्यासी के पास अपने परिवार के साथ बैठ जाता है और उनकी बातों को गंभीरता से सुनने के लिए आग्रह करता है, वह सन्यासी से जीवन के गूढ़ अर्थ को जानने के लिए आग्रह करता है। सन्यासी फिर से कहते हैं " मेरे मित्र अस्तित्व प्रतिक्षण यहाँ तुमसे किसी न किसी रूप में बात कर रहा है, प्रति क्षण तुम्हें स्पर्श कर रहा है, पर न तुम उसको सुन पा रहो हो न महसूस कर पा रहे हो। अस्तित्व अनेकानेक रूपों में तुम्हें आग्रह कर रहा है कि जीवन के इस उत्सव में शामिल हो, सुबह और शाम बस अस्तित्व का आग्रह यही है, पर तुम लगातार किसी और की तलाश में हों,वह तलाश तुम्हें कभी रुकने ही नहीं देती, स्वयं को स्वयं बनने ही नहीं देती। जो मौजूद है उससे हमें वैर है और जो नहीं है बस उसी की चाहत है, यही हमारे जीवन का दुर्व्यवहार भी है, यही जीवन का दुःख भी है"

"अस्तित्व एक उत्सव की तरह हमारे साथ है और जीवन एक त्यौहार है,जहाँ मात्र उत्सव ही उत्सव है।जब हम जीवन में उत्सवों को जीने लगते हैं हमारा जीवन उसी क्षण ही परिवर्तित होते जाता है" सन्यासी कहते हैं कि "माँ गंगा से वरदान की जगह कोशिश करो माँ गंगा को महसूस करने की, अपने आपको माँ गंगा में प्रवाहित करने की, माँ गंगा से वरदान मांगने की बजाय, कोशिश करो माँ गंगा के साथ अभी और यहीं होने की। माँ गंगा सब जानती है, उसे सब पता है, अगर उसे हम माँ मानते ही हैं तो माँ के साथ कुछ पल रहो तो सही"

मुझे यह कहानी बहुत पसंद है, क्योंकि अपनी लगभग पूरी उम्र उस व्यापारी की तरह जीवन काट देते हैं, लगातार जो जीवन में नहीं है उसकी कामना करते हुए, या तो इतिहास में जीते हैं या भविष्य में,वर्तमान हमसे बहुत दूर होता है। जो मौजूद है वह हमसे परिचित ही नहीं और जो नहीं है उसकी ही मांग है।

हर सुबह सूरज उगता है, हमें जीवन की नयी ऊचाईयां देने के लिए, हर शाम वह अस्त होता है, ताकि सितारे हमारी रात को उत्सवों से भर सके, त्यौहार लगातार चलता रहे, हर एक दिन पुष्प हमें जीवन के रंग दिखलाते हैं लेकिन हम अक्सर इन्हें जीवन के समीप देख ही नहीं पाते, हमारा वर्तमान कामना में, जिन्दा ही मर जाता है और यही कामना हमारे हर वर्तमान को शोषण का, पीड़ा का अंतहीन समय बना देती है। हम प्रकृति की सुंदरता, पुष्पों के रंग, पेड़ों की भाषा, जंगलों का मौन देख नहीं पाते, महसूस नहीं जार पाते, जी नहीं पाते, और अस्तित्व के उत्सव् में शामिल नहीं जो पाते, जीवन त्यौहार नहीं बन पाता।

अस्तित्व के आधार में मात्र उत्सव हैं, जीवन त्यौहार है और धर्म का एक मात्र आशय यही है कि जीवन और अस्तित्व के इन गुणों से हम परिचित हो सकें, यही परिचय हमें आध्यात्मिक बनाता है। जैसे ही हम जीवन को त्यौहार के रूप में स्वीकारते हैं, उत्सव की वेदी पर हम स्वयं जीवन का श्रृंगार करते हैं, यहीं से जीवन को नकारना हम बंद कर देते हैं, स्वीकारोक्ति का जागरण होता है, और जहाँ स्वीकार्यता है वहां दुःख कैसा ? यही से जीवन में मौज की, उमंग की खोज होती है, जीवन त्यौहार बनकर अस्तित्व के साथ उत्सव में शामिल  होता है, यही उत्सव हमारा आधार है।

यही से जीवन प्रतिक्षण दैवीय होता जाता है, दिव्य होता जाता है, जहाँ अब प्रतिकार करने के लिए कुछ भी नहीं, जीवन उत्सव के आधार से पवित्रता में समाहित होता जाता है। जिंदगी चलती है और उसके साथ हम चलते रहते हैं। यही साधना है, यही ध्यान है, यही अध्यात्म है।

चलें जीवन को छूने दें, अस्तित्व को आपसे जुड़ने दें,रुकें नहीं,दूर खड़े न हों, बस त्योहारों को मानते रहें, जीवन को उत्सव में शामिल करते रहें। यही से जीवन जीवन बनता है, और उत्सव कभी खत्म नहीं होता।

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