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विवेकानंदजी जैसा चरित्र


विवेकानंदजी जैसा चरित्र

विवेकानंदजी जैसा चरित्र पैदा होता है, जब जीवन के अंदर प्रतिक्षण सवाल होते हैं और सवालों के प्रति हमारी गहरी आस्‍था भी होती है। मैं कहूँ  तो सवाल कुछ ऐसे ही कर लेते हैं,  मैं बहुत सारे कार्यक्रमों में जाता हूँ  और बहुत सारे कार्यक्रमों में सवाल केवल कुछ लोग इसलिए करते हैं कि मेरे स्वरुप में यंग बच्‍चा है, देख लेना चाहते हैं जानता कितना है। मैं कितना जानता हूं इसको जानने के लिए वो कुछ सवाल करते हैं या दो तिहाई समय ये होता है कि चलो ना यार बोल तो रहा है, करने के लिए कर लेते हैं न, जाता क्‍या है।

बात सवालों की नहीं है, सवाल एक श्रृंखला है कि अगर सवाल जवाब बने और जवाब अगर बिना अनुभवों के रह जाए तो वह सवाल नपुंसक है, वो जवाब भी नपुंसक है, क्‍योंकि अगर हम यहां सवाल कर रहे हैं, मुझसे सवाल कर लिया जाए कि क्‍या ईश्‍वर है, मैं कह दूं ईश्‍वर है और हम अगर उसके ऊपर खोज करके ईश्‍वर को पाने की यात्रा पर ना जा पाए तो मेरा पूरा जवाब भी नपुंसक हो जाता है, आपका पूरा सवाल भी नपुंसक हो जाता है,

-विवेक जी "स्वामी विवेकानंद और भारत" व्याख्यान कार्यक्रम से
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