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विवेकानंद जी और भारत


विवेकानंद जी और भारत

यह चर्चा महाराष्ट्र में माननीय विवेक जी द्वारा की गयी थी जिसका जिसको मात्र टाइप करके आपके सामने प्रस्तुत किया  गया है। आप इसकी ऑडियो रिकॉर्डिंग भी सुन सकते हैं, आनंद ही आनंद के YOUTUBE चैनल पर 
सादर प्रणाम।
    आप सभी को प्रणाम करता हूं। विवेकानंदजी का दिन है विषय भी विवेकानंदजी ही हैं। विवेकानंदजी तक पहुंचे, इसके पहले थोड़ी सी बातें जो डाक्‍टर साहब ने कही, वो बातें विवेकानंदजी के तारतम्‍य में भी कहीं आएगी और मुझे लगता है कि शायद उन्‍होंने भी बहुत गहराई के साथ इन बातों पर चिंतन किया होगा, तब जाकर उनका अपनी जिंदगी में कार्यपालन भी किया। एक छोटी सी बात मेरे से किसी ने पूछी कि मालाएं क्‍यों नहीं ? मालाएं आखिर क्‍यों नहीं लेते और पैर क्‍यों नहीं छूने देते ? मजेदार तथ्‍य यह है कि जब इतिहास ने, जब भारतीय इतिहास ने इस सिविलाईजेशन ने, जब मालाओं की पद्धति लाई थी, जब मालाएं पहनाई जाती है तो बहुत इंट्रेस्टिंग बात होती है। उस समय माला पहनने के लिए आपको माला पहनाने वालों से ज्‍यादा झुकना पड़ता है। सम्‍मान लेने से पहले सम्‍मानित होने वाले को जो सम्‍मान दे रहा होता है, उससे ज्‍यादा झुकना पड़ता है, नम्र होना पड़ता है, तब कहीं जाकर सम्‍मान की वजह बनती है। ये माला की बहुत महान बात रही, हम भूलते चले गए। आज माला पहनने वाले अकड़कर कई मालाएं ले लेते हैं। 

    आज सुबह से मैं यूजली कभी टीवी देखने का समय मिलता नहीं न मेरी कोई रूचि है तो आज सुबह शैलेश जी हमारे साथ थे, बातचीत चल रही थी तो मैं सुबह से बैठकर जो भी समय मिला, आज वो जितने ये 24 बाई 7 धर्म मिलते हैं, उन सारी जगहों पर आज मैं टीवी पर देख रहा था। जितने टीवी चैनल हो सकते हैं, सारे चैनल। मजेदार बात जो मुझे दिखाई दी जहां तथ्‍य, जब सम्‍मान जिन्‍हें देना चाहिए, उन्‍हें जितना विनम्र होना चाहिए, कहीं दंभ बहुत ज्‍यादा दिखाई दिया कि जिन मंचों पर सम्‍मान की भावनाएं जब आए, वहां से इतनी नम्रता टपके कि सम्‍मान देने वाला भी करुणा से घायल हो जाए, लेकिन सम्‍मान से ज्‍यादा दंभ इतना ज्‍यादा दिखा कि मुझे लगा कि अभी तक तो जो, मैं इसीलिए..., मैं आज पांच छह साल हो चुके हैं, जब से मैं इस दौर में आया, मैंने कभी मालाएं नहीं स्‍वीकारी, क्‍योंकि इसका बड़ा आध्‍यात्मिक कारण था और दूसरा कारण यह था कि हम मालाएं पहनाने के इतने आदि हो चुके हैं कि हम माला किसको और कब पहनानी है, यह भी भूल चुके हैं। मैंने कहा कम से कम एक बात तो शुरू की जाए कि माला अगर 10-20-50 बार नहीं पहनी गई तो शायद लोग सवाल करना तो शुरू करेंगे कि मालाएं पहनाई क्‍यों न जाए ? 

    एक मजेदार बात रही कि विवेकानंदजी की बातचीत होती है। कई सालों से कार्यक्रम यहां पर चल रहे हैं। बहुत सारे लोग यहां पर आए हैं और आए होंगे। कई तरीकों से विवेकानंदजी पर बातचीत हुई होगी। आप सबने विवेकानंदजी की जयंती भारत में पिछले 80-90 सालों से जब से विवेकानंदजी कहीं अपने शरीर को छोड़कर गए, भारत ने विवेकानंदजी के बारे में जयंतियां काफी मनाई, बहुत जयंती मनती है, लंबी-लंबी चर्चा होती है। उत्तिष्‍ठ भारत: जागृत युवा हो, जगे, खड़ा हो, अपने गोल के तरफ जाएं, लंबी-लंबी बातें होती रहती है। ये सब बातें आपने बहुत सुनी होगी। मैं इस पर कोई बात नहीं करना चाहता, इसलिए बात नहीं करना चाहता, क्‍योंकि मुझे लगता है कि हम उसके आदि हो चुके हैं। उनसे कहीं कुछ होता जाता नहीं। हम हर साल आते हैं, 12 तारीख को कार्यक्रम मनाते हैं, विवेकानंदजी की बात करके चले जाते हैं। जब गेट से बाहर निकलते हैं तो हम वही होते हैं जैसे हम आए थे। चार बार सलूट मारकर चले आते हैं कि हां विवेकानंदजी मान गए आपको, आदमी था। 

    असल में होगा यह कि अगर उन तरीकों से बात कीजिए जैसे बातें अक्‍सर होते रहती है। हम विवेकानंदजी के ऊपर काफी बड़ी-बड़ी बातें करेंगे। बताएंगे उन्‍होंने जिंदगी में क्‍या किया ? कहां से कहां खिंचकर लेकर चले गए। हिन्‍दुस्‍तान में तो जो किया सो किया, विदेशों में क्‍या कर दिया, क्‍योंकि मजेदार बात तो यह है न कि हम अपने लोगों को तब तक नहीं पूजते, जब तक वो विदेशों में कुछ न कर ले। अगर चार छह बार कुछ विदेशों में कर लिया है तो हम उनको पूज भी लेते हैं, पूछ भी लेते हैं, लेकिन अगर वो विदेशों के चार गोरों के बीच बैठकर कोई बात नहीं कर पाता, हम इतने इंफिरियरीटी काम्‍पलेक्‍स से भरे हुए हैं। हम विवेकानंदजी की बात करना चाहते हैं और दुर्भाग्‍य है कि आज कहना पड़ता है। 

    आज बहुत बड़ा दुर्भाग्‍य है कि आज वो लोग जो विवेकानंदजी की जयंती आज इतने दिनों से मना रहे हैं, आज अगर विवेकानंदजी की बात 11 सितंबर और अमेरिका के उद्घाटन से करनी पड़ती है तो मुझे इस बात का बड़ा दुख है, रंज है। रंज इस बात का है कि विवेकानंदजी ने जो बात 11 तारीख को कही थी, 11 सितंबर को, उसके पहले उन्‍होंने चीख-चीख कर वो बातें कही थी, जो बातें भारत आज तक उच्‍चारित नहीं कर पाया। मुझे रंज है, इस बात का दुख है। मैंने नहीं सोचा था कि ये बात घटेगी और इस बात का भी दुख हुआ कि मुझे लगा था कि कम से कम ये जगह है, जहां विवेकानंदजी के बारे में हमने बड़ा सोचा है, विवेक बसो प्रतिष्‍ठान है। मुझे लगा था कि हम एक ऐसी बात करेंगे कि हम 11 सितंबर को भूल जाएं। जहां पर भी विवेकानंदजी की बात होती है, हम पहली बार बात की शुरूआत करते हैं कि 11 सितंबर को उस समय अमेरिका में क्‍या था ? उस रिलेजियस कांफ्रेंस में? भारत ने उसे काफी महिला मंडित भी किया, क्‍योंकि हम तब तक लोगों को नहीं चुनते। मैं आया तो मुझे सबसे पहले दिखाई दिया एमबीए, यूएसए, मैंने इसको मिटाने की कोशिश की, फिर चूंकि ध्‍यान चल रहा था, ध्‍यान के बीच में आवाज आ रही थी कि मिटा नहीं पाया, क्‍योंकि हम लोगों को तब तक स्‍वीकार नहीं करते, जब तक हमें दिख न जाए कि कहीं बाहर की दुनिया में उन्‍होंने कुछ सिद्ध कर दिया है।

    मुझे समझ में नहीं आता कि हम गीता और रामायण को मान कैसे लेते हैं। पता नहीं क्‍यों पिछले सौ दो सौ सालों से गीता, रामायण और शिवलिंग की बात भी कर रहे हैं, क्‍योंकि गीता को तो शोपेन हावर ने खोजा, उसके पहले हम खोज कर बहुत कुछ कर चुके थे। ये भारत का बहुत दुर्भाग्‍य है, हम विवेकानंदजी की बात करते हैं कि हमें जागृत होना है, गोल देखना है, ये करना है, वो करना है, हम सभी इन्‍फीरियरिटी काम्‍पलेक्‍स से भरे हुए हैं। वहीं से शुरूआत करना चाहूंगा, क्‍योंकि वही जड़ है। 

    एक बड़ी मजेदार घटना होती है भारत के संदर्भ में और कहिये ये भारत का महा दुर्भाग्‍य रहा है कि भारत इस संदर्भ में विवेकानंदजी को लेकर कभी कोई बात करना नहीं चाहा। विवेकानंदजी के पीछे चलने वाले लोग कभी इन बातों पर कोई उल्‍लेख भी नहीं कर सके। आपको पता है विवेकानंदजी ने अपने जीवन के जो भावी क्षण थे, जिन क्षणों के बारे में मठ से लेकर रामकृष्‍ण मिशन जब भी बात करता है, मुझे माफ करिएगा, अगर कोई भी बात आपकी आस्‍थाओं पर चोट लगे, इसका कारण नहीं है, लेकिन विवेकानंदजी पर बात हो रही है और उस ओजस्‍वी शब्‍दों से नहीं होगी, जिसको लेकर विवेकानंदजी चले तो उनका अपमान हो जाएगा। 

    आपको पता है कि विवेकानंदजी ने अपने भावी जीवन के कितने दिन जिस भावी जीवन को मठ से लेकर रामकृष्‍ण मिशन तक बड़ी संकल्‍पनाओं से हो हल्‍ला किया जाता है, कितने दिन उन्‍होंने भारत में गुजारे, किसी को कोई आइडिया है, कोई रु आइडिया, कोई रफ आइडिया। उन्‍होंने अपने चौदह साल, जिन चौदह सालों में विवेकानंदजी ने वो जो कुछ भी किया, जिससे रामकृष्‍ण मिशन निकलकर आया या जिसके कारण कहीं मठ बने या जिसके कारण हम हजारों किताबें विवेकानंदजी की देख पाते हैं, उनके बहुमूल्‍य चौदह सालों में से उन्‍होंने करीबन आठ साल विदेशों में गुजारे। 

    हमारे लोग कहते हैं कि विदेशों में शिक्षा दे रहे थे। बता रहे थे कि क्‍या चल रहा है, हिन्‍दू पाठ कर रहे थे। जहां तक मेरी समझ जाती है, विवेकानंदजी को वो आठ साल विदेशों में इसलिए गुजरने पड़े, क्‍योंकि भारत रिसेप्‍टीव नहीं था, उनके आठ सालों को अपने पास खींच लेने के लिए। अगर भारत रिसेप्‍टीव होता तो विवेकानंदजी जैसा आदमी जो भारत के एक-एक कण को एक परमाणु बम बनाने की क्षमता रखता था, वो अपने आठ बहुमूल्‍य साल कभी विदेशों की धरती पर खाक छानते हुए नहीं गुजारता। चूंकि वो आठ साल भारत ने खोए, क्‍योंकि भारत रिसेप्टिव नहीं था, भारत विवेकानंद जी जैसे व्‍यक्ति के विचारों को छूने में उनके विचारों के ऊपर चलने में। हमने बात की 100 युवाओं को लेने में कि एक युवा उनके सामने दिखाई नहीं दिया तो उन्‍होंने कहा कि खोज तो कहीं न कहीं करनी होगी, उनको खुद पलायन करना पड़ा। आठ साल उन्‍होंने बाहर बिताए। 

    यह दुर्भाग्‍य है भारत का, महादुर्भाग्‍य है। दुर्भाग्‍य इसलिए भी है कि अक्‍सर ऐसी घटनाएं भारत में होती है कि भारत तब तक अपने जो मौलिक विचार हैं, जिन विचारों से भारत कहीं बन सकता है, हो सकता है, हम उनको तब तक अपने हाथों की कोई पीर नहीं देते हैं, जब तक दुनिया के बाकी लोग उनके ऊपर अपनी टिप्‍पणियां करके उनको फ्रूटफुल सिद्ध न कर दें। अगर वो सिद्ध कर दे तो हम भी मान लेते हैं। कितने लोग राजयोग, सहजयोग, क्रियायोग किस-किस की बात विवेकानंदजी ने की। पूरा भाषण जो विवेकानंदजी ने दिया था, भारत की किताबों में उसको इतनी बार प्रिंट किया गया है कि अगर हम लिटरेली देखें तो पिछले साठ साल भारत की आजादी के बाद प्रतिदिन कहीं न कहीं किसी न किसी नए लिटरेचर में वो विवेकानंदजी का जो भाषण था, प्रतिदिन प्रिंट हुआ है। 


    हम खूब लंबी-लंबी उसके ऊपर बात करते हैं कि क्‍या कहा ? कहां से क्‍या बातें कही ? कहां से शुरू, क्‍या सर्व धर्म इसकी उसकी सब बातें करते हैं। कल एक छोटी सी बात हुई थी कि प्रोफेसर साहब थे, उन्‍होंने मेरी बात करते हुए कहा कि राष्‍ट्रवादी व्‍यक्ति राष्‍ट्र की बातों को लेकर कहीं, चूंकि विवेकानंदजी का नाम देखा तो अक्‍सर लगता है कि जो लोग विवेकानंदजी की बात करने वाले हैं, वो ठेठ नेशनलिस्‍ट होना ही चाहिए और मजेदार बात है, यह दूसरा महादुर्भाग्‍य है कि विवेकानंदजी को मैं आज कहना यह चाहता हूं कि विवेकानंदजी को जिन अर्थों में हमें समझना चाहिए था, उन अर्थों में जब हम उन्‍हें देख न पाए तो उससे घटनाएं क्‍या घटी ? मैं बिल्‍कुल बात नहीं करूंगा कि विवेकानंदजी कितने महान थे, क्‍या थे। हम सब जानते हैं वो क्‍या थे, कोई इसकी जरूरत नहीं, लेकिन दुर्भाग्‍य इन बातों का है कि विवेकानंदजी को हम वैसा क्‍यों न देख पाए, जिसको देखने के कारण शायद हमारी दृष्टि से हमारे अंदर कोई बदलाव हो जाता। उसी तारतम्‍य में एक-एक करके कुछ बातों तक आऊंगा। कोई बहुत बड़ी टिप्‍पणी नहीं करनी, क्‍योंकि मैं शैलेशजी से पूछ रहा था, शैलेश जी चूंकि विवेकानंदजी के मठ से काफी, रामकृष्‍ण मिशन से बहुत दिनों से जुड़े हुए हैं तो निकलते निकलते पूछा कि बताओ कि बात चलती क्‍या है ? क्‍या लोग बात करते हैं ? क्‍योंकि हर साल तो जयंती मनती है, आखिर बात होती क्‍या है ? क्‍योंकि पहला कार्यक्रम है, जब मुझे किसी जयंती में विवेकानंदजी के ऊपर बोलने के लिए बुलाया गया है। उन्‍होंने बोला बात चलती क्‍या है ? तो मुझे शैलेशजी बता रहे थे कि कोई शिक्षा के ऊपर बात करता है, कोई बात करता है कि रामकृष्‍ण परमहंस ने क्‍या किया ? मैंने बोला जब लोग इतनी सारी बातें कर ही लेते हैं तो बढि़या होगा। इन बातों पर क