विवेकानंद जी और भारत


विवेकानंद जी और भारत

यह चर्चा महाराष्ट्र में माननीय विवेक जी द्वारा की गयी थी जिसका जिसको मात्र टाइप करके आपके सामने प्रस्तुत किया  गया है। आप इसकी ऑडियो रिकॉर्डिंग भी सुन सकते हैं, आनंद ही आनंद के YOUTUBE चैनल पर 
सादर प्रणाम।
    आप सभी को प्रणाम करता हूं। विवेकानंदजी का दिन है विषय भी विवेकानंदजी ही हैं। विवेकानंदजी तक पहुंचे, इसके पहले थोड़ी सी बातें जो डाक्‍टर साहब ने कही, वो बातें विवेकानंदजी के तारतम्‍य में भी कहीं आएगी और मुझे लगता है कि शायद उन्‍होंने भी बहुत गहराई के साथ इन बातों पर चिंतन किया होगा, तब जाकर उनका अपनी जिंदगी में कार्यपालन भी किया। एक छोटी सी बात मेरे से किसी ने पूछी कि मालाएं क्‍यों नहीं ? मालाएं आखिर क्‍यों नहीं लेते और पैर क्‍यों नहीं छूने देते ? मजेदार तथ्‍य यह है कि जब इतिहास ने, जब भारतीय इतिहास ने इस सिविलाईजेशन ने, जब मालाओं की पद्धति लाई थी, जब मालाएं पहनाई जाती है तो बहुत इंट्रेस्टिंग बात होती है। उस समय माला पहनने के लिए आपको माला पहनाने वालों से ज्‍यादा झुकना पड़ता है। सम्‍मान लेने से पहले सम्‍मानित होने वाले को जो सम्‍मान दे रहा होता है, उससे ज्‍यादा झुकना पड़ता है, नम्र होना पड़ता है, तब कहीं जाकर सम्‍मान की वजह बनती है। ये माला की बहुत महान बात रही, हम भूलते चले गए। आज माला पहनने वाले अकड़कर कई मालाएं ले लेते हैं। 

    आज सुबह से मैं यूजली कभी टीवी देखने का समय मिलता नहीं न मेरी कोई रूचि है तो आज सुबह शैलेश जी हमारे साथ थे, बातचीत चल रही थी तो मैं सुबह से बैठकर जो भी समय मिला, आज वो जितने ये 24 बाई 7 धर्म मिलते हैं, उन सारी जगहों पर आज मैं टीवी पर देख रहा था। जितने टीवी चैनल हो सकते हैं, सारे चैनल। मजेदार बात जो मुझे दिखाई दी जहां तथ्‍य, जब सम्‍मान जिन्‍हें देना चाहिए, उन्‍हें जितना विनम्र होना चाहिए, कहीं दंभ बहुत ज्‍यादा दिखाई दिया कि जिन मंचों पर सम्‍मान की भावनाएं जब आए, वहां से इतनी नम्रता टपके कि सम्‍मान देने वाला भी करुणा से घायल हो जाए, लेकिन सम्‍मान से ज्‍यादा दंभ इतना ज्‍यादा दिखा कि मुझे लगा कि अभी तक तो जो, मैं इसीलिए..., मैं आज पांच छह साल हो चुके हैं, जब से मैं इस दौर में आया, मैंने कभी मालाएं नहीं स्‍वीकारी, क्‍योंकि इसका बड़ा आध्‍यात्मिक कारण था और दूसरा कारण यह था कि हम मालाएं पहनाने के इतने आदि हो चुके हैं कि हम माला किसको और कब पहनानी है, यह भी भूल चुके हैं। मैंने कहा कम से कम एक बात तो शुरू की जाए कि माला अगर 10-20-50 बार नहीं पहनी गई तो शायद लोग सवाल करना तो शुरू करेंगे कि मालाएं पहनाई क्‍यों न जाए ? 

    एक मजेदार बात रही कि विवेकानंदजी की बातचीत होती है। कई सालों से कार्यक्रम यहां पर चल रहे हैं। बहुत सारे लोग यहां पर आए हैं और आए होंगे। कई तरीकों से विवेकानंदजी पर बातचीत हुई होगी। आप सबने विवेकानंदजी की जयंती भारत में पिछले 80-90 सालों से जब से विवेकानंदजी कहीं अपने शरीर को छोड़कर गए, भारत ने विवेकानंदजी के बारे में जयंतियां काफी मनाई, बहुत जयंती मनती है, लंबी-लंबी चर्चा होती है। उत्तिष्‍ठ भारत: जागृत युवा हो, जगे, खड़ा हो, अपने गोल के तरफ जाएं, लंबी-लंबी बातें होती रहती है। ये सब बातें आपने बहुत सुनी होगी। मैं इस पर कोई बात नहीं करना चाहता, इसलिए बात नहीं करना चाहता, क्‍योंकि मुझे लगता है कि हम उसके आदि हो चुके हैं। उनसे कहीं कुछ होता जाता नहीं। हम हर साल आते हैं, 12 तारीख को कार्यक्रम मनाते हैं, विवेकानंदजी की बात करके चले जाते हैं। जब गेट से बाहर निकलते हैं तो हम वही होते हैं जैसे हम आए थे। चार बार सलूट मारकर चले आते हैं कि हां विवेकानंदजी मान गए आपको, आदमी था। 

    असल में होगा यह कि अगर उन तरीकों से बात कीजिए जैसे बातें अक्‍सर होते रहती है। हम विवेकानंदजी के ऊपर काफी बड़ी-बड़ी बातें करेंगे। बताएंगे उन्‍होंने जिंदगी में क्‍या किया ? कहां से कहां खिंचकर लेकर चले गए। हिन्‍दुस्‍तान में तो जो किया सो किया, विदेशों में क्‍या कर दिया, क्‍योंकि मजेदार बात तो यह है न कि हम अपने लोगों को तब तक नहीं पूजते, जब तक वो विदेशों में कुछ न कर ले। अगर चार छह बार कुछ विदेशों में कर लिया है तो हम उनको पूज भी लेते हैं, पूछ भी लेते हैं, लेकिन अगर वो विदेशों के चार गोरों के बीच बैठकर कोई बात नहीं कर पाता, हम इतने इंफिरियरीटी काम्‍पलेक्‍स से भरे हुए हैं। हम विवेकानंदजी की बात करना चाहते हैं और दुर्भाग्‍य है कि आज कहना पड़ता है। 

    आज बहुत बड़ा दुर्भाग्‍य है कि आज वो लोग जो विवेकानंदजी की जयंती आज इतने दिनों से मना रहे हैं, आज अगर विवेकानंदजी की बात 11 सितंबर और अमेरिका के उद्घाटन से करनी पड़ती है तो मुझे इस बात का बड़ा दुख है, रंज है। रंज इस बात का है कि विवेकानंदजी ने जो बात 11 तारीख को कही थी, 11 सितंबर को, उसके पहले उन्‍होंने चीख-चीख कर वो बातें कही थी, जो बातें भारत आज तक उच्‍चारित नहीं कर पाया। मुझे रंज है, इस बात का दुख है। मैंने नहीं सोचा था कि ये बात घटेगी और इस बात का भी दुख हुआ कि मुझे लगा था कि कम से कम ये जगह है, जहां विवेकानंदजी के बारे में हमने बड़ा सोचा है, विवेक बसो प्रतिष्‍ठान है। मुझे लगा था कि हम एक ऐसी बात करेंगे कि हम 11 सितंबर को भूल जाएं। जहां पर भी विवेकानंदजी की बात होती है, हम पहली बार बात की शुरूआत करते हैं कि 11 सितंबर को उस समय अमेरिका में क्‍या था ? उस रिलेजियस कांफ्रेंस में? भारत ने उसे काफी महिला मंडित भी किया, क्‍योंकि हम तब तक लोगों को नहीं चुनते। मैं आया तो मुझे सबसे पहले दिखाई दिया एमबीए, यूएसए, मैंने इसको मिटाने की कोशिश की, फिर चूंकि ध्‍यान चल रहा था, ध्‍यान के बीच में आवाज आ रही थी कि मिटा नहीं पाया, क्‍योंकि हम लोगों को तब तक स्‍वीकार नहीं करते, जब तक हमें दिख न जाए कि कहीं बाहर की दुनिया में उन्‍होंने कुछ सिद्ध कर दिया है।

    मुझे समझ में नहीं आता कि हम गीता और रामायण को मान कैसे लेते हैं। पता नहीं क्‍यों पिछले सौ दो सौ सालों से गीता, रामायण और शिवलिंग की बात भी कर रहे हैं, क्‍योंकि गीता को तो शोपेन हावर ने खोजा, उसके पहले हम खोज कर बहुत कुछ कर चुके थे। ये भारत का बहुत दुर्भाग्‍य है, हम विवेकानंदजी की बात करते हैं कि हमें जागृत होना है, गोल देखना है, ये करना है, वो करना है, हम सभी इन्‍फीरियरिटी काम्‍पलेक्‍स से भरे हुए हैं। वहीं से शुरूआत करना चाहूंगा, क्‍योंकि वही जड़ है। 

    एक बड़ी मजेदार घटना होती है भारत के संदर्भ में और कहिये ये भारत का महा दुर्भाग्‍य रहा है कि भारत इस संदर्भ में विवेकानंदजी को लेकर कभी कोई बात करना नहीं चाहा। विवेकानंदजी के पीछे चलने वाले लोग कभी इन बातों पर कोई उल्‍लेख भी नहीं कर सके। आपको पता है विवेकानंदजी ने अपने जीवन के जो भावी क्षण थे, जिन क्षणों के बारे में मठ से लेकर रामकृष्‍ण मिशन जब भी बात करता है, मुझे माफ करिएगा, अगर कोई भी बात आपकी आस्‍थाओं पर चोट लगे, इसका कारण नहीं है, लेकिन विवेकानंदजी पर बात हो रही है और उस ओजस्‍वी शब्‍दों से नहीं होगी, जिसको लेकर विवेकानंदजी चले तो उनका अपमान हो जाएगा। 

    आपको पता है कि विवेकानंदजी ने अपने भावी जीवन के कितने दिन जिस भावी जीवन को मठ से लेकर रामकृष्‍ण मिशन तक बड़ी संकल्‍पनाओं से हो हल्‍ला किया जाता है, कितने दिन उन्‍होंने भारत में गुजारे, किसी को कोई आइडिया है, कोई रु आइडिया, कोई रफ आइडिया। उन्‍होंने अपने चौदह साल, जिन चौदह सालों में विवेकानंदजी ने वो जो कुछ भी किया, जिससे रामकृष्‍ण मिशन निकलकर आया या जिसके कारण कहीं मठ बने या जिसके कारण हम हजारों किताबें विवेकानंदजी की देख पाते हैं, उनके बहुमूल्‍य चौदह सालों में से उन्‍होंने करीबन आठ साल विदेशों में गुजारे। 

    हमारे लोग कहते हैं कि विदेशों में शिक्षा दे रहे थे। बता रहे थे कि क्‍या चल रहा है, हिन्‍दू पाठ कर रहे थे। जहां तक मेरी समझ जाती है, विवेकानंदजी को वो आठ साल विदेशों में इसलिए गुजरने पड़े, क्‍योंकि भारत रिसेप्‍टीव नहीं था, उनके आठ सालों को अपने पास खींच लेने के लिए। अगर भारत रिसेप्‍टीव होता तो विवेकानंदजी जैसा आदमी जो भारत के एक-एक कण को एक परमाणु बम बनाने की क्षमता रखता था, वो अपने आठ बहुमूल्‍य साल कभी विदेशों की धरती पर खाक छानते हुए नहीं गुजारता। चूंकि वो आठ साल भारत ने खोए, क्‍योंकि भारत रिसेप्टिव नहीं था, भारत विवेकानंद जी जैसे व्‍यक्ति के विचारों को छूने में उनके विचारों के ऊपर चलने में। हमने बात की 100 युवाओं को लेने में कि एक युवा उनके सामने दिखाई नहीं दिया तो उन्‍होंने कहा कि खोज तो कहीं न कहीं करनी होगी, उनको खुद पलायन करना पड़ा। आठ साल उन्‍होंने बाहर बिताए। 

    यह दुर्भाग्‍य है भारत का, महादुर्भाग्‍य है। दुर्भाग्‍य इसलिए भी है कि अक्‍सर ऐसी घटनाएं भारत में होती है कि भारत तब तक अपने जो मौलिक विचार हैं, जिन विचारों से भारत कहीं बन सकता है, हो सकता है, हम उनको तब तक अपने हाथों की कोई पीर नहीं देते हैं, जब तक दुनिया के बाकी लोग उनके ऊपर अपनी टिप्‍पणियां करके उनको फ्रूटफुल सिद्ध न कर दें। अगर वो सिद्ध कर दे तो हम भी मान लेते हैं। कितने लोग राजयोग, सहजयोग, क्रियायोग किस-किस की बात विवेकानंदजी ने की। पूरा भाषण जो विवेकानंदजी ने दिया था, भारत की किताबों में उसको इतनी बार प्रिंट किया गया है कि अगर हम लिटरेली देखें तो पिछले साठ साल भारत की आजादी के बाद प्रतिदिन कहीं न कहीं किसी न किसी नए लिटरेचर में वो विवेकानंदजी का जो भाषण था, प्रतिदिन प्रिंट हुआ है। 


    हम खूब लंबी-लंबी उसके ऊपर बात करते हैं कि क्‍या कहा ? कहां से क्‍या बातें कही ? कहां से शुरू, क्‍या सर्व धर्म इसकी उसकी सब बातें करते हैं। कल एक छोटी सी बात हुई थी कि प्रोफेसर साहब थे, उन्‍होंने मेरी बात करते हुए कहा कि राष्‍ट्रवादी व्‍यक्ति राष्‍ट्र की बातों को लेकर कहीं, चूंकि विवेकानंदजी का नाम देखा तो अक्‍सर लगता है कि जो लोग विवेकानंदजी की बात करने वाले हैं, वो ठेठ नेशनलिस्‍ट होना ही चाहिए और मजेदार बात है, यह दूसरा महादुर्भाग्‍य है कि विवेकानंदजी को मैं आज कहना यह चाहता हूं कि विवेकानंदजी को जिन अर्थों में हमें समझना चाहिए था, उन अर्थों में जब हम उन्‍हें देख न पाए तो उससे घटनाएं क्‍या घटी ? मैं बिल्‍कुल बात नहीं करूंगा कि विवेकानंदजी कितने महान थे, क्‍या थे। हम सब जानते हैं वो क्‍या थे, कोई इसकी जरूरत नहीं, लेकिन दुर्भाग्‍य इन बातों का है कि विवेकानंदजी को हम वैसा क्‍यों न देख पाए, जिसको देखने के कारण शायद हमारी दृष्टि से हमारे अंदर कोई बदलाव हो जाता। उसी तारतम्‍य में एक-एक करके कुछ बातों तक आऊंगा। कोई बहुत बड़ी टिप्‍पणी नहीं करनी, क्‍योंकि मैं शैलेशजी से पूछ रहा था, शैलेश जी चूंकि विवेकानंदजी के मठ से काफी, रामकृष्‍ण मिशन से बहुत दिनों से जुड़े हुए हैं तो निकलते निकलते पूछा कि बताओ कि बात चलती क्‍या है ? क्‍या लोग बात करते हैं ? क्‍योंकि हर साल तो जयंती मनती है, आखिर बात होती क्‍या है ? क्‍योंकि पहला कार्यक्रम है, जब मुझे किसी जयंती में विवेकानंदजी के ऊपर बोलने के लिए बुलाया गया है। उन्‍होंने बोला बात चलती क्‍या है ? तो मुझे शैलेशजी बता रहे थे कि कोई शिक्षा के ऊपर बात करता है, कोई बात करता है कि रामकृष्‍ण परमहंस ने क्‍या किया ? मैंने बोला जब लोग इतनी सारी बातें कर ही लेते हैं तो बढि़या होगा। इन बातों पर कोई बात की न जाए, क्‍योंकि लोग इससे बोर हो चुके हैं और सैकड़ों बार शायद इनको सुन भी लिया होगा और शायद हो सकता है, वही सुनने के लिए दोबारा आए होंगे। बड़े अच्‍छे लोग हैं। मैं रियली कहता हूं कि अभी भी भारत के अंदर और खासकर गांवों में इन छोटे शहरों में बड़े अच्‍छे लोग रहते हैं कि एक ही बात को दस बार सुनने के लिए हम बार-बार आ जाते हैं। बड़ी अच्‍छाई है। विवेकानंदजी ने अपने एक-एक बात जो मैं बार-बार पूछता रहा, इस कार्यक्रम के पहले भी और जब भी विवेकानंदजी की बात निकली कि क्‍या हम उन कारणों पर जा सके, हमने देखना चाहा कि आखिर वो कारण क्‍या थे, जिनसे विवेकानंदजी जैसे व्‍यक्ति बनते हैं, क्‍या कारण होते हैं ? आखिर ऐसे कौन से रिजन हैं, जिसके कारण कहीं कोई नरेन्‍द्र दत्‍त विवेकानंद बनकर पूरे, हम सभी को उनके ऊपर विचार विमर्श करने पर भी मजबूर कर देता है, वो कारण क्‍या हैं ? क्‍योंकि इसके ऊपर बात करना कि विवेकानंदजी कितने महान थे, उन्‍होंने क्‍या-क्‍या दिया, कितना बढि़या मिशन बनाया, वो सब तो होती रहती है, चल भी रही होगी कहीं न कहीं। 

    आज एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि विवेकानंदजी, आज मैंने बताया कि टीवी देख रहा था, बहुत दिनों बाद देखी। विवेकानंदजी एक बात कहते थे - 'मानव सेवा परम सेवा' 'सर्विस'। विवेकानंदजी पहले व्‍यक्ति थे बीते 100 साल में, उसके बाद तो उसका चलन आ गया। अब तो सारे कोई भी धर्म का आदमी है, वो जब तक सर्विस की बात न करें, तब तक उसकी धार्मिकता जायज नहीं ठहराई जाती। उसको सर्विस देना बहुत जरूरी है और मजेदार बात यह है कि आज सारे धर्म के मंचों से धार्मिक संस्‍थाओं से सर्विस की बात निकलकर आ रही है, अच्‍छी बात है। यह विवेकानंदजी की देन है। 

    मैं समझता हूं कि उन्‍होंने मानव सेवा परम सेवा की बात नहीं की होती तो भारत का धार्मिक जगत् जिस तरीके से समाज की बातों को लेकर मौन और निष्‍ठुर था, वैसा ही वो बचा रह जाता। एक बड़ी अच्‍छी बात विवेकानंदजी के कारण हुई, पता नहीं आपसे लोगों ने कहा होगा या नहीं कि आज एक-एक धार्मिक प्रतिष्‍ठान, मैं उनको प्रतिष्‍ठान कहता हूं। एक-एक धार्मिक प्रतिष्‍ठान और कोई भी महाराज और कोई भी बाबा वो जब तक समथिंग, सो काल्‍ड मानव सेवा के बारे में बात न करे या आपसे इसको लेकर डोनेशन न ले, तब तक वो काम होता नहीं, तब उसको धार्मिक नहीं माना जाता। ये बड़ा महत्‍वपूर्ण कार्य विवेकानंदजी के कारण हुआ, क्‍योंकि अगर उन्‍होंने मानव सेवा परम सेवा की अगर टिप्‍पणी नहीं की होती तो भारत का धार्मिक महत्‍व, जितना निष्‍ठुर समाज के औचित्‍य के बाबत् था, उतना ही निष्‍ठुर हमेशा बचा रह गया होता। 

    असल में आज मैं यहां से सवाल रखना चाहता हूं, कल भी उसके ऊपर बातचीत की थी, आज उस बातचीत को एक स्‍टेप और आगे ले जाना चाहता हूं कि आखिर वो कारण क्‍या थे, जिसके कारण कहीं कोई एक नरेन्‍द्र दत्‍त विवेकानंद बन जाता है, क्‍योंकि अगर हम उन कारणों के ऊपर थोड़ी सी भी बातचीत कर सके, सोच सके, जान सके तो एक संभावना तो दे पाएंगे कि अगर थोड़ा सा भी कोई प्रेम उस आदमी के बारे में है, जिसके प्रति हमने दीपक जलाई है, अगर थोड़ा सा भी प्रेम है तो बाकी सारी किताबें पब्लिश करने के अलावा उनके नाम पर 10 लाख पेड़ लगाने के अलावा, एक रामकृष्‍ण मिशन की स्‍थापना करने के अलावा हम शायद एक कोशिश कर सकेंगे कि वो जो 100 युवा जिनको वो खोज रहे थे, हम एक ही युवा इस अपने नगर, अपने शहर से या हो सके अपने घर से बनाने की कोशिश तो शुरू करें, क्‍योंकि विवेकानंदजी के बारे में एक नहीं 10 करोड़ किताबें लिख दी जाए, कोई अर्थ नहीं निकलता जब तक विवेकानंद जी जैसा व्‍यक्तित्‍व इस धरा पर चले नहीं। हम कितनी भी किताबें लिख दें, कितने भी प्‍लांटेशन करा दें, कितने भी रामकृष्‍ण मिशन की स्‍थापनाएं करा दें, कितने भी स्‍कूल खोल दें, जो स्‍कूल चल रहे हैं, अर्थ कुछ नहीं निकलता, जब तक उस जैसे व्‍यक्ति को हम दोबारा अपने, कहीं समाज के बीच से चलने पर मजबूर न कर दें।    उन कारणों पर जाना बड़ा जरूरी है कि वो कारण क्‍या थे, जिनके कारण से कहीं कोई नरेन्‍द्र दत्‍त विवेकानन्‍द बनने पर मजबूर हो जाता है, क्‍योंकि ऐसा तो है नहीं कि विवेकानंदजी के पहले कोई युवा नहीं थे। ऐसा भी नहीं है कि रामकृष्‍ण परमहंस के पहले कोई महान गुरु नहीं थे, लेकिन वो संभावनाएं क्‍या थी, जिसका इस्‍तेमाल विवेकानंदजी ने भी किया और जिसका पूरी तरीके से रामकृष्‍ण परमहंस जी ने भी किया। आखिर वो रिजन क्‍या थे ? उन रिजनिंग के ऊपर अगर बात हुई तो मैं समझता हूं, जो भी हमारा 10 मिनट, 15 मिनट का कार्यक्रम होगा, वो कार्यक्रम मेरी नजरों में सफल हो जाएगा, क्‍योंकि हम उठाएंगे उस कारणों को जहां से नरेन्‍द्रदत्‍त विवेकानंद बनता है। 

    कल मैंने एक बात की कि आध्‍यात्‍म का महीन से महीन अर्थ है एक गहरा सवाल। एक बड़ी मजेदार घटना होती है कि विवेकानंदजी बचपन से एक गहरे सवाल पर सोचते हुए चलते रहते हैं कि क्‍या ईश्‍वर है, पूछते रहते हैं, चलते रहते हैं। हमको बड़ा मामूली लगता है कि हम सभी पूछ लेते हैं आकर कि भई ध्‍यान और समाधी क्‍या है, थोड़े बहुत जवाब मिल जाते हैं। कमरों के बाहर निकलते हैं तो ध्‍यान भी खो जाता है, समाधी भी खो जाती है। हम पूछ लेते हैं कि आत्‍मा परमात्‍मा है। आत्‍मा परमात्‍मा की यहां पर बात ही अगर कुछ रियली ठीक-ठाक लोग हैं, वो यहां से निकलते हैं, सब भूलकर चले जाते हैं, पान खाते हैं और रास्‍तों का सफर करके निकल जाते हैं। अक्‍सर यह होता है। 

    असल में दो बड़ी मजेदार बात है, जिन बातों को लेकर कहीं विवेकानंद जैसा व्‍यक्तित्‍व तैयार खड़ा होता है। एक बात है कि एक सवाल जो विवेकानंदजी ने प्रति क्षण शायद अपने आपसे भी किया और उस हरेक व्‍यक्ति से किया, जिसको उसने कहीं धार्मिक अनुसंज्ञा या धार्मिक रिसेप्‍टीविटी का व्‍यक्ति माना। सवाल करता रहा कि क्‍या ईश्‍वर है। साथ में एक बड़ी मजेदार बात यह है कि कभी उसका पता नहीं था, नरेन्‍द्रदत्‍त को पता नहीं था कि ईश्‍वर है कि नहीं, लेकिन इस सवाल को उसने तब तक नहीं छोड़ा, जब तक उसको जवाब हॉं या नहीं में मिल नहीं गया। एक सवाल और एक सवाल के बाद हमेशा प्रति क्षण खोज कि इसका जवाब या तो मुझे हॉं में मिल जाए और या न में और जवाब की बात नहीं, मेरे अनुभव में आ जाए कि हॉं ये बात है या नहीं। बड़ी महत्‍वपूर्ण बात है यही विवेकानंद का संपूर्ण जीवन है कि एक सवाल जिसके प्रति वे प्रति क्षण पड़े रहे, जब तक उन्‍हें वो व्‍यक्ति नहीं मिल गया, जिसकी आंखों में देखकर उन्‍होंने पाया कि हाँ इसके पास जाकर मैं तो जवाब पा जाउंगा, हाँ में या तो जवाब पा जाउंगा ना में। उस सवाल के पीछे प्रतिक्षण पड़ा रहा। 

    विवेकानंदजी जैसा चरित्र पैदा होता है, जब जीवन के अंदर प्रतिक्षण सवाल होते हैं और सवालों के प्रति हमारी गहरी आस्‍था भी होती है। मैं कहूं तो सवाल कुछ ऐसे ही कर लेते हैं कुछ लोग। मैं बहुत सारे कार्यक्रमों में जाता हूं और बहुत सारे कार्यक्रमों में सवाल केवल कुछ लोग इसलिए करते हैं कि यंग बच्‍चा है, देख लेते हैं जानता कितना है। तो मैं कितना जानता हूं इसको जानने के लिए वो कुछ सवाल करते हैं या दो तिहाई समय ये होता है कि चलो ना यार बोल तो रहा है, करने के लिए कर लेते हैं न, जाता क्‍या है। एक बहुत बड़े धार्मिक व्‍यक्ति हुए थे, जिन्‍होंने पहली बार-गुर्जीएफ हुए थे, पश्चिम में रशिया से आए थे। भारत में उन्‍होंने काफी सफर तय किया और भारत से बहुत कुछ सीखकर वापस रशिया गए, फिर फ्रांस चले गए, सब कुछ। तो भारत में उन्‍होंने देखा कि लोग तो यहां पर प्रतिक्षण सवाल करते हैं। पश्चिम में ऐसा होता नहीं था, पश्चिम में प्रथा ही सवालों की नहीं थी। बता दिए जाए, उतना हमको ले लेना है। सवालों की कोई प्रथा नहीं थी। जब गुर्जीएफ यहां से वापस गए तो उन्‍होंने लोगों से कहा कि सवाल पूछो, बिना सवाल के धर्म नहीं मिल सकता तो लोग उनके पास कुछ भी सवाल पूछ भी लिया करते थे तो गुर्जीएफ ने फिर क्‍या किया कि वो एक सवाल के पूछने के पहले उस जमाने में या तो दस रूबल लेते थे या जब यूरोप में थे तो फ्रेंक लेते थे कि अगर आपको सवाल पूछने है तो इतने पैसे दे दो, नहीं तो सवाल का जवाब नहीं दूंगा, क्‍योंकि हम तो सवाल इसलिए भी पूछ लेते हैं कि हमारे अंदर उन सवालों के उत्‍तर से कुछ बदल सकता है या नहीं, इससे हमें मतलब नहीं है। मैं कल की बात को आगे निकालकर लेकर जाना चाहता हूं कि विवेकानंद जी को बनने के लिए जीवन में चाहिए, जीवन के समष्टि के प्रति सवाल हो, उन्‍होंने सवाल ईश्‍वर के संबंध में किया था। जरूरी नहीं कि हम भी ईश्‍वर के संबंध में करें। सवाल किया और सवाल से बड़ी महत्‍वपूर्ण बात है कि सवाल किया था, जिससे वाकई उनकी जिंदगी के अंदर कुछ बदल सकता था। सवाल केवल सवाल करने के लिए नहीं किया था। हम तो कर लेते हैं, क्‍योंकि लगता है कि चलो ना यार बोल रहा है, कर लेते हैं, होता है या नहीं होता है, कमरे के बाहर गए, सवाल भी खो गया, जवाब भी खो गया। 

    एक दूसरी बड़ी महत्‍वपूर्ण बात जो विवेकानंद जी के संबंध में है वो ये कि सवाल से यात्रा शुरू करता है, बाद में अनुभवों की बात करता है कि केवल उत्‍तर पा लेने के बाद भी रुकता नहीं है, वो उत्‍तर को देखना चाहता है कि ये उत्‍तर मुझ पर भी संभव हो सकता है। नहीं तो उन्‍होंने तो जवाब दे ही दिया था, परमहंस ने जवाब दिया था कि जैसा मैं तुझे देख रहा हूं, वैसे प्रतिक्षण ईश्‍वर को भी देखता हूं। तब विवेकानंद जी कहते हैं कि जवाब बस वही, अब तो मुझे भी दिखाओ कि अब बात केवल उसकी नहीं कि उत्‍तर मिल गया, वो तो एक उत्‍तर मिल गया, अब जब तक मेरे अनुभव में न आए, वो उत्‍तर कितना सही है, इसकी जानकारी मुझे पता तक नहीं है। 

    बात सवालों की नहीं है, सवाल एक श्रृंखला है कि अगर सवाल जवाब बने और जवाब अगर बिना अनुभवों के रह जाए तो वह सवाल नपुंसक है, वो जवाब भी नपुंसक है, क्‍योंकि अगर हम यहां सवाल कर रहे हैं, मुझसे सवाल कर लिया जाए कि क्‍या ईश्‍वर है, मैं कह दूं ईश्‍वर है और हम अगर उसके ऊपर खोज करके ईश्‍वर को पाने की यात्रा पर ना जा पाए तो मेरा पूरा जवाब भी नपुंसक हो जाता है, आपका पूरा सवाल भी नपुंसक हो जाता है, क्‍योंकि कहीं से कोई प्रोटेंसी नहीं ला सकता।