विशाल जामसांवली पदयात्रा


विशाल जामसांवली पदयात्रा

पद यात्राओं का आध्यात्म की धरा में बड़ा मान रहा है, सदियों से लोग पैदल चलते हुए आस्था के केंद्रों तक पहुँचते रहे हैं। मध्य प्रदेश की धरा में एक वीर हनुमान जी का मंदिर है जिसे जामसांवली मंदिर के नाम से जाना जाता है, मैं इस मंदिर में वर्षों पहले सबसे पहली बार गया था, और कहीं पास में ही क्रांतिपीठ की स्थापना कुछ वर्षों पहले हुई।


पांढुर्ना जो की एक प्राचीन शहर है, जिसका इतिहास हज़ारों सालों पुराना है, इस प्राचीन शहर से एक प्राचीन हनुमान मंदिर से एक पद यात्रा जिसे विशाल जामसांवली पद यात्रा कहते हैं, हर साल दिसंबर के अंत में जामसांवली मंदिर तक जाती है, यह देश की सबसे बड़ी दुरी ( ३८ किलोमीटर)  को एक दिन में तय करने वाली पद यात्रा है। और अगर रास्ते में थोड़ा मोड़ा फर्क पड़े तो लगभग ४० किलोमीटर की हो जाती है।


लगभग दो वर्षों में मैं इस यात्रा में चलता हूँ, और चलते हैं हज़ारों की संख्या की भक्त लगभग जब भी जामसांवली पद यात्रा होती है लगभग पूरा क्षेत्र में कुछ न कुछ कर रहा होता है, कुछ लोग सेवा कर रहे होते हैं, कुछ अपने हाथों ध्वज को थामे प्रभु स्मरण करते हुए अपने आत्मविश्वास की धार पर  पैदल यात्रा कर रहे होते हैं। लगभग लगभग ४०-५० हज़ार लोग बच्चे, बूढ़े, महिला, पुरुष, अपने सारे वर्गों, भेद भाव को मिटाकर साथ में चलते हैं, ऐसे एकता के भाव अगर देश में स्थापित हो जाएँ इस राष्ट्र का उन्नति अनंत की है।

सबसे अनूठी घटना तो यह है कि पांढुर्ना के एक बालक ने इस अनूठी और सबसे कठिन यात्रा में से एक यात्रा का स्वप्न  ६ वर्ष पहले देखा था २०१७ इस यात्रा का सातवाँ वर्ष था, जब मैंने उस बालक से पूछा कि कभी इस स्वप्न  को देखते हुए दर नहीं लगा ? उस बालक ने कहा कि अगर मैं ये स्वप्न न देखता तो इस असंभव को संभव में परिवर्तित कैसे किया जाता ? मैं इसे हनुमान जी का प्रसाद ही मानता हूँ क्योंकि जब जब भारत के युवा समाज के संघटन, संस्कृति, और आत्मविश्वास को लेकर स्वपन देखते रहेंगे यह राष्ट्र नूतन आधार गढ़ता रहेगा।


 पद यात्रा के सफल संचालन के बाद मैं जब कल उन स्वसेवियों से मिल रहा था जो यात्रा के पीछे इसकी सफलता के लिए कार्य करते हैं, मुझे देख अचरज हुआ कि स्वपन देखने वाले युवा, मनोज गुधडे के साथ जो  युवा मेरे पास आये, वो न तो थके थे, न रुके थे, असंभव स्वपन देखने का रूपांतरण जो उनमें हुआ। उन सारे युवाओं को जो, जो पहचाने जाते होने अलग अलग नाम, कुछ का नाम मुझे अच्छी तरीके से पता है पर कुछ का नहीं पर ये १५-२० युवा वो टोली है जो कुछ भी कर सकती है, ये नग्न पैर ध्वज लेकर, रात भर काम करती हुई, कीर्तन करती हुई, ट्रैफिक संभालती हुई, कहीं पद यात्रियों के लिए वापस पहुंच सेवा देती हुई, कहीं श्री राम का रथ संचालन करती हुई, कहीं केवल अन्य युवाओं और बुजुर्गों का देखभाल करती हुई, कुछ पद यात्रियों के पीछे कचरे को इकठ्ठा करती हुई और ना जाने कितने व्यवस्था करती हुई, बस श्री राम रास में डूबी, संस्कृति की अनूठी परंपरा को जीवंत करती हुई।


ऐसे युवकों से ही राष्ट्र जीवंत होता है, ऐसे युवाओं से ही संस्कृति का अनंत प्रवाह चलता है, ऐसे युवा ईश्वर का आदेश मानकर जब समाज में होते हैं तब ही आध्यात्म का दिया निरंतर जलता है।

ऐसे तपस्वी युवाओं को मेरा सर्वस्व !

ऐसे युवा ही भारत का कालनिर्णय हैं, ऐसे स्वपन ही जीवन का निर्णय है।