सन्यास मेरी देखी


सन्यास मेरी देखी

भारत में एक ऐसा मीडिया का वर्ग कार्य करता है जिसने धर्म और आध्यात्मिक संहिता को सबसे बड़ा आघात किया है। और भारत का सीधा साधा मन कभी इस आघात को देख नहीं पाया, ये वही लोग हैं जिन्होंने चंद लोगों को, मीडिया का coverage देकर सन्यासी नहीं व्यापारी बना दिया और ये वही लोग हैं जो इन लोगों के पीछे समस्त सन्यास को ही अपवित्र कर देना चाहते हैं।


आख़िर वैदिक मान्यता और इसकी सन्यास परम्परा में आघात आना कहाँ से शुरू हुआ? ये आघात तब बनने शुरू हुए जब मीडिया और व्यापार के वर्गों ने कथावाचकों के पीछे राजनीति और व्यापार की चाय बनाकर लोगों को भ्रमित करना शुरू किया, जब भारत में सन्यास की परम्परा में उन लोगों को मान्यता और शीर्षता देनी शुरू की जिनके पास धन बल हुआ, इससे एक बड़ी बात यह हुई कि जिन लोगों ने जीवन में सन्यास की परम्परा में धन बल को महत्व नहीं दिया वो लोग मीडिया के coverage के बाहर हो गए, और यही लोग हैं जिन्होंने सन्यास की परम्परा को जीवंत बनाए रखा।


आज एक वातावरण बनाया जा रहा है उस वातावरण में पूरी सन्यास की परम्परा और इसके मूल्य को अपवित्र किया जा रहा है, एक दो लोग के आधार से पूरी परम्परा को दूषित किया जा रहा है। पर इसके भीतर का खेल क्या है? खेल है एक ऐसी संस्कृति का निर्माण करना जहाँ वैदिक परम्परा हो ही ना, तब क्या होगा? धर्म की दीक्षा और जीवन का ज्ञान देने वाले लोग बचेंगे ही नहीं, सन्यास को अपवित्र कर यही वर्ग समस्त संस्कृति को समाप्त करने में सक्षम हो जाएगा। ऐसा मत समझिए कि ये कहीं हुआ नहीं, यही पूरे यूरोप में हुआ, यही हुआ उन राष्ट्रों में जहाँ कहीं दर्शन और सन्यास की परम्परा सबसे महान थी ( ग्रीस)। यहीं से वामपंथ ने अपने बीज रखे यहीं से वो व्यापार चला जहाँ केवल जीवन में द्वन्द है।


हमें इस खेल से ज़्यादा यह समझना होगा हम कैसे सन्यास की परम्परा का स्वागत करना चाहते हैं? उनसे जो दर्शन से ज़्यादा धन को महत्व देते हैं? जिनके आश्रम में पाँच सितारा होटेल हैं या उनके क़रीब जो सामन्य लोगों के साथ सामन्य जीवन से सन्यास की परम्परा में जीते हैं? आज दर्शन देने वाले लोग हैं कितने? जीवन में क्रांतिकारी विचार देने वाले लोग हैं कितने? सन्यास एक क्रांति है, कबीर, नानक एक क्रांति हैं, रैदास, स्वामी अरुणेश एक क्रांति हैं, वो केवल जीवन के क्रांति दर्शन और विचार दे सकते हैं।

अगर इस खेल से बचना हैं और अगर समाज को बचाना है सबसे ज़्यादा ज़रूरत सामाजिक लोगों के सचेत होने की है, क्योंकि समाज तो उनको मूल्य देता है जो आपसे धन खींचते हैं, जो पाँच सितारा होटेल जैसे सुविधाओं में रहते हैं, जो गाँव गाँव, शहर शहर घूमते नहीं, लोगों से मिलते नहीं, दर्शन की नूतन परम्पराओं और विचारों का उद्घोष नहीं करते बल्कि ऑर्कस्ट्रा लेकर आपको भ्रमित करते हैं।


मुझे परहेज़ नहीं कहने से की सन्यास का कार्य जीवन को नयी दिशा देने है, शास्त्रों के नूतन और क्रांतिकारी अर्थ जन जन तक पहुँचाने का है, एक नूतन समाज की व्यवस्था को निर्मित करने का है, राजनीति से साँठ गाँठ करने का नहीं अपितु राजनीति को सामाजिक व्यवस्था और जन हित के कार्य करने पर मजबूर करने का है, मंत्रिपद लेने का नहीं अपितु मंत्रिपरिषद को वो कार्य देने का है जहाँ से जीवन के उचित निर्णय लिए जाएँ।