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धर्म-समाज

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    Admin
  • 11 जन॰ 2012
  • 1 मिनट पठन

धर्म-समाज

मैं बिल्‍कुल विवेकानंद जी की बात से सहमत हूं कि धर्म समाज के प्रति उदासीनता नहीं है, लेकिन साथ ही साथ धर्म और आध्‍यात्‍म की बात करने वाले लोग, अगर सक्रिय राजनीति में जाने की कोशिश करने लगे, उसे दिन धर्म खत्‍म हो जाएगा, क्‍योंकि रास्‍ता दिखाने वाले लोग, जरा सोचिए, अगर जो ट्राफिक लाईट होती है, मैं समझता हूं धर्म की बात करने वाले लोग समाज की भूमिका में ट्राफिक लाईट की बात है कि बताए दिशा कहां है, मार्ग बता रहे हैं कि दिशा कहां है। अगर दिशा बताने वाला यंत्र ही खुद ही रास्‍तों पर चलने लगे तो रास्‍ता बताने वाला बचेगा कौन ? बड़ी भगदड़ मच जाएगी, सब अंडबंड हो जाएगा। हो यही रहा है कि जिन्‍हें रास्‍ता बताना चाहिए वो देखते हैं रास्‍ता बताने से अच्‍छा है रास्‍ते पर चलने में ज्‍यादा मजा है। चलो चल ही लेते हैं। महाराज बनने वाले लोग अक्‍सर राजनीति की लंबी यात्रा कर ही लेते हैं, कर ही रहे हैं और भारत उनको करने भी दे रहा है - ये भारत का दुर्भाग्य है।


-विवेक जी "स्वामी विवेकानंद और भारत" व्याख्यान कार्यक्रम से


 
 
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